Thursday, November 5, 2009





अतुल मिश्र
गंगाजी में स्नान करने से इंसानों के जो पाप हैं, वे धुल जाते हैं ! लोग गंगा-स्नान करने इसलिए भी जाते हैं कि पुराने पापों को धोकर वे नए पाप करने के लिए तैयार हो सकें ! यूं तो गंगा-स्नान वाले दिन दो बूंद गंगाजल मिला कर घर पर भी नहाया जा सकता है, मगर लोगों और लोगानियों को नहाते हुए देखने से आंखों को थोड़ी-सी तरावट मिल जाती है ! यूं तो तरावट रास्ता चलते भी लोगों को मिल जाती है, मगर वह उतनी नैसर्गिक नहीं होती, जितनी कि गंगा-घाट पर मौजूद होती है !

भारत में गंगा-स्नान कि परंपरा हजारों साल से चलती चली आ रही है ! जो लोग साल में दो-तीन दफा ही नहाने में यकीन रखते हैं, इस दिन वे लोग इस बहाने से नहा भी लेटे हैं और उन्हें कई महीने तक अपने नहाने की सूचना देने का मौका भी बात-बात में मिल जाता है ! कई लोग ऐसे भी होते हैं , जो गंगा-स्नान पर दस-पंद्रह दिन पहले से गंगा-किनारे अपने तम्बू तानकर वहां जुए कि प्राचीन रिवायत को अंजाम देते हैं, ताकि महाभारत होने की वजह को अपनी आने वाली नस्लों को सौंप सकें ! मदिरा-पान भी अब काफी हो गया है यहां, जिससे सरकारी राजस्व में तो बढ़ोतरी तो होती है,लोगों की मस्ती में भी बढ़ोतरीहोती है, जो कि एक अच्छी बात है !

खर्चा बचाने के लिए लोग अपने घरों से खाना बना कर ही यहां लाते हैं ! इसके बाद सारा कूड़ा-करकट गंगा के हवाले करके "हर-हर गंगे ! नहा लिए नंगे !!" जैसे कष्टदायक गाने भी गाते हैं ! शरारती किस्म के लोग यह महावाक्य इस लिहाज़ से बोलते हैं, ताकि सनद रहे और उनकी तरफ गौर फरमाने के काम आये !

कुल मिलाकर, संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पापनाशिनी गंगाजी का महत्त्व हमारे जीवन में पापों से भी अधिक है, क्योंकि भागीरथ महाराज अगर इसे चीन कि बजाय हमारे देश में न लाये होते तो हमारे देश में पाप सहित पापियों का बोझ इतना ज्यादा बढ़ जाता कि हम लोग चुल्लू भर पानी में डूबने लायक पोजीशन में भी नहीं पहुंच पाते ! गंगा-स्नान पर इससे ज्यादा और कुछ नहीं लिख जा सकता, मास्साब ! इसलिए नम्बर ज़रा सोच-समझ कर दें !


2 comments:

Bindu Chopra said...

Bahut khoob likhtay hain aap Atulji!

hindwaarta said...

Bahut-Bahut Dhanyavaad, Bindu Ji !!