Wednesday, April 28, 2010


अतुल मिश्र
वह एक आदर्श भारतीय बेरोजगार था. देशभक्ति के साथ ही बेरोज़गारी भी उसके अन्दर कूट-कूटकर समाई हुई थी. पढ़ा-लिखा होने के बावज़ूद बेरोज़गार रहना, जहां उसकी देशभक्ति में कई सारे चांद लगा रहा था, वहीँ, उसकी बेरोज़गारी से उसके अटूट रिश्ते को भी दर्शा रहा था. उसे इस बात का कभी ग़म नहीं रहा कि वह रोज़गारविहीन है और पता नहीं कब तक इन्हीं हालातों में रहेगा ? वह जानता था कि वह जब तक चाहे, तब तक ऐसे ही रह सकता है. यह उसकी सहनशीलता और बाप की ऊपरी कमाई की सूचना देने को काफी था कि कितनी है ? ऊपर वाले पर वह उतना ही भरोसा करता था, जितना सरकार देश से बेरोज़गारी का नामोनिशान तक मिटा देने में करती है.

कई मर्तबा वह नौकरी की तलाश में अपना क़स्बा छोड़कर शहर भी गया था, मगर नौकरी ना मिलने के ग़म में अंग्रेजी सिनेमा की अल्पवस्त्री कन्यानुमा महिलाओं को देखकर ही हमेशा वापस आ गया. उसके फादरनुमा बाप को इससे तकलीफ़ हुई और उन्होंने उसे एक कमरा लेकर वहीँ शहर में रहने की अनुमति दे दी कि जब तक नौकरी ना मिले, वहीँ रहकर कोशिश करते रहो. इसका परिणाम यह हुआ कि वह अपने लिए नौकरी तो नहीं तलाश पाया, मगर अपने लिए एक ऐसी लड़की ज़रूर तलाश लाया, जिससे शादी करके वह अपने बाप की तरह अपना घर भी बसाने लायक कहा जा सके. भारतीय बेरोजगारों के साथ यह दिक्कत यहां की गर्म जलवायु की वजह से होती है या जिस भी वजह से, मगर होती ज़रूर है. वे लड़की तलाशने के बाद ही यह सोचते हैं कि अब नौकरी भी तलाश लेनी चाहिए.
इंटरव्यू देते वक़्त वह यह कभी नहीं सोचता था कि नौकरी मिल ही जायेगी. उसे पता ही नहीं था, बल्कि पूरा यक़ीन था कि उसकी तमाम मार्कशीटें देखने के बाद उसे नौकरी देने वाले की नौकरी भी चली जाएगी, इसलिए वह तटस्थ होकर नौकरियों के आवेदन भेजने में लगा था. इसकी पूरी सूचना वह मकान-मालिक की लड़की के अलावा अपने बाप को भी दे दिया करता था कि सनद रहे और वक़्त ज़रूरत नौकरी ना मिलने पर किये गए कुतर्कों के जवाब देने के काम आये. जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि वह एक आदर्श बेरोज़गार था और वही बने रहने की दिशा में निरंतर प्रयत्नशील था.

शहर में रहकर जो सबसे बड़ी उपलब्धि उसने अपने बलबूते पर हासिल की, वह अपने मकान-मालिक की लड़की को किन्हीं प्राकृतिक और बेहद गोपनीय कारणों से पटाने की थी और जिस पर उसके बाप ने भले ही नाज़ ना किया हो, मगर मां को पूरा यक़ीन था की बेटा शहर से कुछ ना कुछ हासिल करके ज़रूर लाएगा. यही उसका मकसद था और यही उसकी अंतिम उपलब्धि थी. अंतिम इसलिए कि उसके बाद की तमाम उपलब्धियां, जैसे बच्चे, राशन और अब हिंदी फिल्में, इनके लिए उसने अपने बाप के अलावा ईश्वर को चुन रखा था कि वे उसे हासिल करके देंगे. इसी आदर्श को लेकर कस्बे के कई अन्य बेरोज़गार भी शहरों की ओ़र रवाना हुए, मगर वे सफल नहीं रहे, क्योंकि उनके बापों की ऊपरी कमाई नहीं थी. यही एक वजह थी, जो उसे आज भी एक सफल बेरोज़गार बनाए हुए थी.

Tuesday, April 27, 2010

हमारे शहर के निराले कुत्ते



        अतुल मिश्र 

    धर्मराज युधिष्टिर ने जो सबसे गलत काम किया, वह यह था कि वे खुद तो स्वर्ग की सीड़ियाँ पार करके चले गए, मगर अपने उस कुत्ते को पीछे ही छोड़ गए, जिसके नाम को लेकर अभी भी एकमत होने के चक्कर में इतिहासकार एकमत नहीं हो पाए हैं. अखबारों में अपना नाम ना छापने की शर्त पर कुछ इतिहासकारों ने यह मानने का दावा किया है कि इंडिया में कुत्तों का आदि पूर्वज वही कुत्ता था और बाकी सब जो देश भर में घूम रहे हैं, वे उसके वंशज हैं. प्राचीन काल में कुत्तों को वह सम्मान प्राप्त था, जो वफादारी की कमी होने की वजह से आदमी का भी नहीं रहा होगा. बेवफाई की कसमें खाने पर लोग कहा करते थे कि " खा, अपने कुत्ते की कसम कि तूने बेवफाई नहीं की. " बाद में यही बेवफाई शायरी में महबूबा के लिए इस्तेमाल की जाने लगी.
    हमारे शहर में नगर पालिका होने की वजह से कुत्तों की पैदावार भी खूब हो रही है. ऐसा क्यों है, यह रिसर्च का विषय होने के बावज़ूद अभी तक किसी शोधार्थी के गाइड के दिमाग में नहीं आ पाया है. रास्ता चलते कौन सा कुत्ता, कब काट ले, कुछ नहीं कहा जा सकता. जो लोग कुत्तों से डरते हुए साइड में निकलने की कोशिशें करते हैं, कुत्ते सबसे ज़्यादा उसी शख्स की तरफ मुखातिब हो लेते हैं और तब अपनी पैंट में मौजूद टांगों की रक्षा के लिए उसके अन्दर से भर्राई सी आवाज़ निकलती है कि "  बचा लो, यार, यह किन सज्जन का कुत्ता है ? " वह आदमी इस बात को जानता है कि अगर " यह किस कमबख्त का कुत्ता है, " जैसी कोई बात बोल दी तो वह कभी भी अपने कुत्ते से कटवाए बिना बाज नहीं आएगा.
    हमारी कॉलोनी को ही ले लीजिये. ऐसी-ऐसी नस्लों के कुत्ते लोगों ने पाले हुए हैं कि वे लाख 'हट-हट' या 'शीट-शीट' जैसी ध्वनियाँ करने के बावज़ूद, जब तक अच्छे भले आदमी की रही सही जान नहीं ले लेंगे, उसे यूं ही घूरते रहेंगे. इन कुत्तों से डरकर भागने  की ज़रा सी बात अगर मन में भी सोच ली तो समझें कि वे या तो शराफत से आपको आपके घर के अन्दर तक दौड़ाकर आयेंगे, या बहुत मूड में हुए तो  ऐसी जगह पर काटेंगे कि आप यह बताने की पोज़ीशन में भी नहीं रहेंगे कि यहीं पर क्यों काटा, अन्य किसी उपयुक्त स्थान पर क्यों नहीं ?
    भौंकने की अवस्था में काटने के संकेत देने पर कुत्ते को चुपाने का एक ही तरीका है और जो बहुत कारगर माना जाता है. जितनी जोर से कुत्ता भौंक रहा है, उससे भी जोर से अगर भौंक दिया जाये तो कुत्ते को थोड़ी सी तसल्ली मिल जाती है कि आदमी और कुत्ते का कॉम्बिनेशन है, इसलिए इसे ना काटा जाये तो ही सही है. ना काटे जाने वाला आदमी अपनी इस गुप्त विद्या को अपने बच्चों को भी सिखा जाता है, ताकि इंजेक्शनों का खर्चा बचाने के काम आये. अब कोई कुत्ता पागल है या नहीं है, यह जानने के चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहिए, वरना हर कुता अपने आप को पागल समझने की गुस्ताखी के एवज़ में इस कदर काट खाता है कि इंजेक्शन लगाने लायक जगह भी ढूंढनी मुश्किल हो जाये कि अब ये कहां लगाएं ?

Monday, April 26, 2010

एलियंस की डायरी में लालू यादव

एलियंस की डायरी में लालू यादव 
                        अतुल मिश्र 


     एलियंस की एक डायरी किसी वैज्ञानिक को मिली थी, जिसे पढकर वह हैरान रह गया कि प्रथ्वी के बारे में वे लोग वही सोचते हैं, जो हम लोग खुद अपने बारे में मन करते हुए भी कभी सोचना नहीं चाहते. किसी अखब़ार के हवाले से आज जो भी पता चला है, वह उस डायरी के बारे में ज़्यादा है, जो हिंदी में अपने पटना-प्रवास के दौरान एलियंस द्वारा लिखी गयी थी और जब वह वैज्ञानिक अपनी पालतू भैंस को चारा डालने गया था तो उसकी सहचरी भैंस ने सिर्फ़ इसलिए वह डायरी चबा ली कि उसे पहले चारा क्यों नहीं डाला गया ? बहरहाल, डायरी तो भैंस के इस दुनिया में ना होने की अहम् वजह से आज इस दुनिया में नहीं है, मगर वह वैज्ञानिक से ज़्यादा अखब़ार वालों के सामने कुछ सवाल खड़े कर रही हैं.
    भैंस द्वारा चबा ली गयी उस डायरी के कुछ अंश आज भी उस वैज्ञानिक को याद हैं. उसकी शुरूआत में ही लिखा है कि हम प्रमाणित करते हैं कि हम सब जो धोखे से अपनी यह डायरी यहां छोड़े जा रहे हैं, यह हमारी ही है और इसमें हमारी कोई ऐसी मंशा नहीं है कि हम प्रथ्वी वासियों को जलील करें या उन्हें उनकी औक़ात दिखा दें कि फिलहाल क्या है और अगर वे चाहते तो क्या हो सकती थी ? हम लोग शान्ति के साथ अपने ग्रह पर ही रहने में खुश हैं. पहले हमने सोचा था कि प्रथ्वी पर चलकर कोई सरकारी ज़मीन ले लेंगे, मगर यहां आकर पता चला कि वह ज़मीन, जो हमने पसंद की थी, वह नेताओं ने कब्ज़ा रखी है और इस जन्म में हमें नहीं मिल सकती, लिहाज़ा हमने फैसला कर लिया कि हम अपने ग्रह पर ही घिचपिच में रह लेंगे, मगर इस ग्रह पर मीडिया कि सुर्खियां बनने के लिए कभी भी नहीं आयेंगे.
    एलियंस की इस चबा ली गयी डायरी में साफ़-साफ़ लिखा है कि हम जाना तो कहीं और चाहते थे, मगर किसी इंडिया नामक मुल्क के पटना नामक शहर में हमारे यान का ईंधन ख़त्म हो गया और हमें वहीँ उतरना पड़ा. यहां ईंधन तो हमें 'ब्लैक' नामक किसी ख़ास व्यवस्था की वजह से नहीं मिला, मगर यह जानकारी ज़रूर मिली कि यहां पर हमसे मिलते-जुलते कुछ ऐसे प्राणी ज़रूर रहते हैं, जो नेतागिरी के अलावा और कोई काम नहीं करते. ज़्यादा जानकारी करने पर हमें बताया गया कि यहां पर  खुद से गयी-गुज़री समझी जाने वाली भैंसों का चारा खाने वाले लोग भी रहते हैं और अगर ज़्यादा दिन तक हम यहां पर रुके तो हमारा बचा-खुचा चारा, जिसे हम लोग 'खाना' कहते हैं, भी खा लिया जाएगा और फिर डकार भी नहीं ली जायेगी कि कोई सबूत भी रहे.
    डायरी में आगे लिखा था कि यहां के चिड़ियाघर को देखने  की इच्छा ज़ाहिर करने पर हमें किसी लालू प्रसाद यादव नामक प्राणी के घर पर छोड़ दिया गया कि यहां पर सभी किस्म के प्राणी आते-जाते मिल जायेंगे. हमने उक्त प्राणी के घर के दरवाज़े पर जब दस्तक दी तो दातून नामक कोई चीज चबाते हुए कोई प्राणी आया और हमसे अजीब किस्म की भाषालापी शैली में पूछने लगा कि " क्या हमारी ससुराल से आये हो ? " हमारे ख़ामोश रहने पर फिर हमसे पूछा गया कि " भाई, बोलते काहे नहीं हो कि हमारी पार्टीवा ज्वाइन करने आये हो ? " इस दौरान हमने देखा कि सवाल पूछने वाले के कानों के पास  इतने बाल उग आये थे, जितने उसके पूरे सिर पर भी नहीं रहे होंगे. हमने वहां की ज़मीन के नमूने लिए और किसी तरह ईंधन का जुगाड़ करके अपने ग्रह की तरफ निकल लिए, ताकि इस पर हम रिसर्च करके यह अंदाजा लगा सकें कि चारा खाकर भी कोई आदमी कैसे ज़िन्दा रह सकता है ? डायरी के अंत में नीतीश कुमार नाम के किसी एलियंस के हस्ताक्षर साफ़ दिखाई दे रहे थे.
       

Sunday, April 25, 2010

बवाल-ए-फोन-टेपिंग


           अतुल मिश्र 

    विपक्षी दलों की फोन-टेपिंग का मामला जब सामने आया तो कई नेताओं की दिन की नींद और रात का चैन ( जो ज़ाहिर है की बिस्तरों पर ही मिलता है ) अचानक गायब हो गया. सुबह संसद में सोने वाले नेता भी जाग गए की पता नहीं रात में होने वाली हमारी कौन सी सीक्रेट बात रिकॉर्ड कर ली गयी हो ? क्या पता कि रामकली से घर जल्दी आने की बात कहकर लाजवती यानि लज्जो से होटल जल्दी पहुंचने की बात हो या आई.पी.एल.के घपलों में अपनी हिस्सेदारी से मुक्त होने के जुगाड़ की कोई बात की गयी हो. कल रात भर नेताओं के हाथ-पैर फूले रहे कि पता नहीं हमारी कौन सी 'ह्युमन वीकनेस' यानि मानवीय कमज़ोरी पब्लिक के सामने लाने की साज़िश रची जा रही हो कि कभी इलेक्शन में खड़े होना तो  अलग, नामांकन कराने लायक पोज़ीशन भी ना रहे हमारी.
    आज सुबह से ही संसद की इमारत यह सोचने में लगी थी कि मैंने पता नहीं कौन से ऐसे बुरे कर्म अपने पिछले जन्म में किये थे, जो आज उनकी सज़ा एक शोरमचाऊ इमारत के रूप में जन्म पाकर भुगतनी पड़ रही है. जिन लोगों के फटे हुए गले पहले से ही इस लायक नहीं हैं कि वे उन्हें और ज़्यादा फाड़ सकें, वे भी गला फाड़-फाड़कर कह रहे हैं कि " यह जो कुछ भी हुआ या अभी भी हो रहा है, वह लोकतंत्र के मुंह पर ( अगर वह वाक़ई में कहीं दिखता है तो ) एक ना पड़ने लायक तमाचा है. " संसद के उस वीरान कोने में, जहां लोग बीड़ियों और सिगरेटों के टोंटे फ़ेंक दिया करते है, लोकतंत्र खड़ा हुआ सोच रहा था कि इस मुल्क के नेता हर मसले में मेरे मुंह पर ही तमाचा क्यों पड़वाते हैं, खुद के मुंह पर क्यों नहीं ?
    " यह हमारी गोपनीयता के अधिकारों का हनन है और इसे जब तक हम यह सरकार बदलकर अपनी सरकार ना ले आयें, नहीं होने देंगे. " किसी ऐसे विपक्षी सांसद की आवाज़ उनके गले में से बार-बार कुछ सोचते हुए निकलने के प्रयास करती है, जो पिछले दिनों ही अपने गले में आज़ादी के बाद से जमे बलगम को साफ़ कराके अमरीका से लौटे थे.
    " यह सरासर ज़्यादती है, तानाशाही है और मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि... वो क्या नाम है उसका.....लोकतांत्रिक.....लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास है. " कोने में खड़े लोकतंत्र का मन कर रहा था कि वह अभी उस सांसद का गला पकड़ ले, जिसने इस बार फिर उसके ह्रास होने जैसी कोई गन्दी बात की है. खुद के चरित्र का कितना ह्रास कर लिया है इसने, यह कभी नहीं सोचा इस नेता ने ? लोकतंत्र आज कुछ ज़्यादा ही दुखी था.
    " सरकार को हम सबसे और इस देश की जनता से माफ़ी मांगनी होगी कि इस तरह की हरकतें वह फिर नहीं करेगी. " किसी ऐसे सांसद की आवाज़ इस बार सदन में गूंजी, जो पहले कभी सरकार में मंत्री-पद पर था और अभी भी उम्मीद में था कि उसे फिर से सरकार में अपनी हिस्सेदारी वापस मिल जायेगी.
    संसद में इस फोन-टेपिंग प्रकरण के विरुद्ध सबसे ज़्यादा गला उन्हीं लोगों ने फाड़ा था, जो पिछले कई महीनों से खुलेआम आई.पी.एल., मैच- फिक्सिंग, सट्टे और महिला-मित्रों के संसर्ग में थे और अपने हिस्सेदारों से स्वीटजरलैंड में बैंक-खाते खोलने की प्रक्रियाएं पूछ रहे थे. सबसे ज़्यादा हंगामा यही लोग कर रहे थे. सरकार से माफ़ी मांगने की मांग करने वाले लोग वे थे, जिनकी सोच यह थी कि अगर माफ़ी मांग ली तो ठीक और अगर शर्म या किन्हीं अडचनों की वजह नहीं मांगी, तो उनकी सरकार को समर्थन दे देंगे. समर्थन देने में क्या घिस रहा है ? लेकिन अगर समर्थन नहीं दिया तो सरकार का तो कुछ नहीं घिसेगा, मगर हमारा सब कुछ घिस जाएगा.
    

Saturday, April 24, 2010

भविष्यवाणी एक मानसून की


भविष्यवाणी एक मानसून की 
                       अतुल मिश्र 
    सरकार जब यह महसूस करने लगती है कि पब्लिक गर्मी के अलावा बिजली-कटौती और महंगाई जैसी अपने आप उत्पन्न होने वाली समस्याओं से  ग्रस्त है, तो उसे खुश करने के लिए कुछ ऐसे विद्वान् समझे जाने वाले विद्वानों से परामर्श किया जाता है, जो मौसम विभाग के दफ्तरों में बैठे जम्हाइयां ले रहे होते हैं. उनसे पूछा जाता है कि हर साल की तरह इस साल भी क्या देख रहे हैं कि मौसम कैसा रहेगा ? वहां से सूचना आती है कि किसान नाम का वोटर इस साल सबसे ज़्यादा खुश रहेगा, क्योंकि मूसलाधार बारिश होने के तमाम संकेत हैं. इस साल सिर्फ़ मूसल ना बरसकर लगातार मूसलाधार बारिश होने की भी निन्न्यान्वे प्रतिशत संभावना है. एक प्रतिशत इसलिए छोड़ दी कि मानसून का मूड बदल गया और वो पड़ोसी मुल्क की तरफ निकल लिया तो फ़जीहत ना हो कि मौसम विभाग ने तो ऐसा कहा था और यह क्या हो रहा है ?
    मौसम विभाग ही एक मात्र दुनिया का ऐसा विभाग है, जो ईश्वर में पूरी आस्था रखता है. जो करेगा, वही करेगा, हम तो उसकी सिर्फ़ भविष्यवाणी कर सकते हैं कि वह क्या करने जा रहा है ? भविष्यवाणी ग़लत हो गयी तो बता दिया कि जैसी प्रभु की इच्छा !  इस महकमे के हालत कुछ ऐसे हो गए हैं कि हिन्दुस्तानी लोग इनकी भविष्यवाणियों पर अब यक़ीन नहीं करते और उन्होंने अगर कहा कि मूसलाधार बारिश होगी, तो किसान फ़ौरन किसी साहूकार से एडवांस में उधार ले लेता है कि सूखा पड़ने के वक़्त काम आएगा. मौसम विभाग जो कहे उसका उल्टा समझकर उसी हिसाब से लोग अपनी व्यवस्थाएं कर लेते हैं.
    सूखा पड़ने की सूचना मिलने पर किसान अपना बाहर पड़ा अनाज उठाकर झोंपड़ी में रख लेता है और जिन पर अपने पक्के मकान होते हैं, वे उसकी छतों की दरारें ठीक कराने लग जाते हैं कि अचानक मानसून आ गया तो एक अच्छा और ग़रीब वोटर होने के नाते मुफ्त में मिले इस सरकारी मकान में कहीं मुंह छिपाने को जगह तो मिल जाये ? वरना इन आवंटित मकानों के निर्माण में रेता तो लगा ही है, जहां ज़रुरत समझी गयी है, सीमेंट का छौंका भी लगा दिया गया है कि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत मकान ढहने के बाद सीमेट के अवशेष ढूंढ़कर दिखाने के काम आये.
    पहले लोग मौसम का हाल चिड़ियों के पानी में नहाने, चींटियों के अन्डे ले जाने और गधों के लोटने से ही अंदाज़ लगा लिया करते थे कि घमासान बारिश होगी. और ऐसा भी नहीं है कि बारिश ना होती हो कि मैं तो नहीं होती. उसे चिड़ियों, चींटियों और गधों की लाज बचाने के लिए होना ही पड़ता था. अब वैसी बातें नहीं रहीं और मौसम विभाग ने चिड़ियों, चींटियों और गधों के कार्य संभाल लिए कि अब हमें करने है तो वे कर रहे हैं. यह भी हो सकता है कि मौसम विभाग अपने उपकरणों की असफलता के बाद इन्हीं प्राकृतिक संकेतों का सहारा ले रहा हो, क्योंकि कई साल पहले मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी कि आज बारिश होगी तो बाक़ायदा अगले दिन बारिश हो गयी थी. 

Friday, April 23, 2010

रामभरोसे का डाईरिया


रामभरोसे का डाईरिया 
                 अतुल मिश्र 

    बीमार होने के बाद रामभरोसे के मन में बिना किसी नैसर्गिक क्रिया के इस ख़्वाहिश ने जन्म ले लिया कि लोगों को उनकी इस बीमारी के बारे में कुछ इस तरह से पता चले कि वे अपनी सम्वेदनायें व्यक्त करने लगें. बिस्तर पर पड़े हुए वे घंटों से इसी बात पर अपना चिंतन कर रहे थे कि अगर उनकी बीमारी के बारे लोगों को पता ही नहीं चला तो लानत है ऐसी बीमारी पर. कई बार उन्होंने अपनी कर्कशा लगने वाली बीवी से भी आहिस्ता से पूछ लिया कि किसी का फोन तो नहीं आया था ? इसके अलावा यह हिदायत भी विनम्रतापूर्वक उन्होंने दे रखी थी कि अगर कोई मुझे पूछे तो बता देना कि बीमार चल रहे हैं आजकल. बीवी ने कुछ इस अंदाज़ में सिर हिलाकर उनको तसल्ली दी कि अगर याद रहा तो बीमारी भी बता दूंगी कि रात में उठकर चोरी से मिठाई खाने की वजह से दस्त लगे हैं. 
    कई बार जब बीमार आदमी से कोई उसका हाल ना पूछकर घड़ी का टाइम पूछने आता है तो उसे जो कष्ट होता होगा, उसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल होता है कि किस किस्म का होता होगा ? रामभरोसे को दो दिन से दस्त लगे थे और जो तमाम देशी इलाज़ के बावज़ूद जब थमने में नहीं आये तो यह कन्फर्म हो गया था कि मामला अब गंभीर हो गया है और अगर खर्चा किये बिना डॉक्टर को नहीं दिखाया तो पता नहीं वह कैसी  शक्ल अख्तियार कर ले ? राम भरोसे को पूरी उम्मीद थी कि कई महीने का बकाया किराया लेने वाला उनका मकान-मालिक तो ज़रूर ही उनके घर आएगा और तब वे उसे कराहते हुए कहेंगे कि ऐसे हालात में यह कोई बात है करने लायक ? देख नहीं रहे हैं कि क्या हालात हैं हमारे ? ना कुछ खाने के, ना कुछ पीने के रहे. उस पर किराए की बात करने से टेंशन हो गयी तो हालत और भी खराब हो सकती है और जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी आपकी ही होगी.
    " क्या हो गया ? सुना है हालत ज़्यादा खराब है ? " कोई दोस्त राम भरोसे को फोन करके कन्फर्म करता है.
    " हां, यार, कई दिन से ऐसी ही हालत चल रही है. डॉक्टर कहता है कि डाईरिया हो गया है. " बीमारी अगर अंग्रेजी में ही बताई जाये तो उसकी महत्ता बढ़ जाती है. वरना हिंदी में अगर दस्त होने की बात कह दी जाये तो लोग ऐसे मुंह बना लेते हैं, जैसे इस बीमारी की कोई कद्र ही ना हो.
    " यह कहो ना कि दस्त हो गए हैं. डाईरिया तो बहुत ऊंची बीमारी है, वह तुम्हें नहीं हो सकती. अंग्रेजों की बीमारी है और उन्हीं को होती है. " रामभरोसे की बीमारी को ख़ास तवज़्ज़ो ना देकर दोस्त फोन रख देता है.
    " कमबख्त को बीमारी से भी जलन होने लगी. सारी अच्छी बीमारियां जैसे उसी के भाग्य में ही हैं, हम तो जैसे अंग्रेजों वाली बीमारी मोल ले ही नहीं सकते. " राम भरोसे का पारा आसमान पर इसलिए नहीं जा पाया कि अगर वह आसमान पर चला जाता तो उनका डाईरिया चारपाई पर बिखरा दिखाई देता.
    सुबह ही सुबह कई दिनों बाद जमादारनी आई तो उसने पूछ लिया कि " बाबूजी के दस्त अब काबू में हैं कि नहीं ? " रामभरोसे ने बिना बीवी के जवाब का इंतज़ार किये ही चारपाई से लगभग उठते हुए जवाब दिया " हां, अब काफी राहत है पहले से, चंपा. " चंपा समझ गयी कि उसे देखकर सदा मुस्कराने वाले एक और शख्स  की कमी जल्दी ही पूरी हो जायेगी. रामभरोसे ने चारपाई से उठने का एक असफल प्रयास किया तो उनकी कर्कशा लगने वाली बीवी ने फ़ौरन उन्हें लिटा दिया. रामभरोसे ने लाख कहा कि वे अब बिलकुल सही हैं और चल-फिर सकते हैं, मगर बीवी ने नहीं उठने दिया. चंपा की एक मुस्कान ने उनका डाईरिया लगभग ठीक कर दिया था. वे बहुत देर तक इस बात पर विचार करते रहे कि अगर ऐसी ही मुस्कानें  लोगों की बीवियों की भी लगने लगें तो कोई भी बीमारी आसानी से किसी को अपनी गिरफ़्त में नहीं ले सकती.

Monday, April 19, 2010

सड़ी हुई गर्मी का पड़ना


सड़ी हुई गर्मी का पड़ना 
                   अतुल मिश्र   


    हर साल गर्मियों में लोगों को इतनी सड़ी गर्मी लगती है, जितनी इससे पहले कभी नहीं लगी. बची-खुची कसर अखब़ार और न्यूज़ चैनल पूरी कर देते हैं यह बताकर कि पारा आसमान फाड़कर ऊपर निकल गया है और अब ढूंढने से भी नहीं मिल रहा कि उसे नीचे ला सकें. न्यूज़ को ऐतिहासिक बनाने के  लिए कोई न्यूज़ चैनल  बताता है कि एक बार मुग़ल बादशाह अकबर के ज़माने में इतनी गर्मी पड़ी थी, तो अकबर ने बीरबल से इसकी वजह पूछी. बीरबल ने कहा कि हुज़ूर, अपने मुल्क की चारों दिशाओं में आपका जो तेज़ बढ़ रहा है, उसकी वजह से ऐसी गर्मी हो गयी है. इस बारे में चैनल उस क़िताब का ज़िक्र करना भी नहीं भूलता, जिसका नाम " आईने-अकबरी " है और जिसे अनारकली से वक़्त मिलने पर अकबर बादशाह लिख लिया करते थे. 
    चैनल बताता है कि " आईने-अकबरी " में भी हालांकि इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है, मगर कुछ बुजुर्गों ने अपने बुजुर्गों से ऐसा सुना था, इसलिए यह ग़लत भी नहीं हो सकता. गर्मी से बेहाल लोग किस तरह घर से बाहर निकलकर अपनी रोजी-रोटी के कामों से जा रहे हैं, इसी को तस्वीरों की मार्फ़त दिखाने में स्थानीय अखब़ार अपने दो-तीन पेज भर देते हैं. इनमें सबसे ज़्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि आरक्षण के ख्वाब देख रहीं महिलायें कैसे मुंह पर कपड़ा बांधे निकल रही हैं ? उनका कपड़े बांधना और ना बांधना दोनों ही न्यूज़ बन जाते हैं.आदमी अगर बुर्का पहनकर भी निकले तो कोई फोटो वाली न्यूज़ नहीं बनती.
    " गर्मी से बेहाल, स्कूल जाते नौनिहाल, " जैसी ख़बरें हर साल इसी किस्म के टाइटिल के साथ प्रेस-फोटोग्राफर और पड़ोसिनों के बच्चों के 'फोटुओं' के ज़रिये स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन जाती हैं. लोग अखब़ार देखकर पूरी तैयारी से अपने दफ्तरों या दुकानों की ओ़र रवाना होते हैं कि कहीं लेने के देने ना पड़ जाएं. तरह-तरह की ख़बरें छपती हैं कि फलां जगह गर्मी से इतने लोग मरे. अब वे लोग भले ही भूख से मरे हों, सरकारी रिकॉर्ड में जो दर्ज़ हो गया, वही अंतिम सत्य बन जाता है. सरकारें इन हालातों से सख्ती से निपटने की घोषणाएं करती हैं और अंत में यह निर्णय लिया जाता है कि लोग बिना पानी पीने से मर रहे हैं, इसलिए जगह-जगह प्याऊ लगवाकर क्यों ना उन्हें नगर-निगम का पानी पिलाकर ही मारा जाये.
    गर्मी के साथ एक प्रोब्लम यह भी है कि यह उन्हीं दिनों में पड़ती है, जब गर्मियों के दिन होते हैं. जाड़ों में गर्मियां जब पड़ने लगेंगी तब कोई दिक्कत नहीं होगी, ऐसा सरकार का मानना है. गर्मियों में बिजली भी अपने पूरे नखरे दिखाती है और जब मन हुआ तब आती-जाती है. जिस दिन यह पूरे दिन आती है, उस दिन लोग समझ जाते हैं कि शहर में सत्तारूढ़ पार्टी का कोई मंत्री वगैरह आया होगा. जिस बिजली की भारी किल्लत इन दिनों बताई जाती है, वह किसी नेता के आते ही कहाँ से आयातित की जाती है, इसे बिजली-अफसरों के अलावा और कोई जानना भी चाहे तो कभी नहीं जान सकता.

Sunday, April 18, 2010


बम-धमाके और इल्ज़ाम

Posted Star News Agency Friday, April 16, 2010 
अतुल मिश्र
बम-धमाके होने के बाद हम इतना ज़रूर सोचते हैं कि होने के लिहाज़ से इन्हें नहीं होना चाहिए था और इनके पीछे जिन लोगों का हाथ है, उनको उनके हाथों सहित जल्दी से जल्दी गिरफ्तार कर लेना चाहिए. हमेशा की तरह अगर वे गिरफ्त में नहीं आते हैं,  तो पड़ोसी मुल्क से कहना चाहिए कि वे हमें गिरफ्तार करके दे, ताकि हम उन पर कोई भी ऐसी कार्यवाही कर सकें, जो उचित लगने के हिसाब से उचित हो. धमाके होने के बाद सरकार सोचती है कि इसके पीछे किनका हाथ दिखाया जाना है कि हो सकता है ? बमों के टुकड़ों को जोड़कर हिसाब लगा लिया जाता है कि इस बार भी इनके पीछे विरोधी दलों की कोई साज़िश ना होकर दहशतगर्दों की खुराफात ही लगती है और जिसे बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

    एक ज़माना वह भी था, जब हवा में कोई जहाज भी अगर क्रैश हो गया तो सरकारें अपने विरोधियों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराती थीं कि उन्होंने ही नीचे से फूंक मार कर कोई हरकत की है, जो इस तरह का ख़तरनाक हादसा हो गया. सरकारों पर तब शायद इसके सिवाय कोई काम नहीं था कि किसी तरह पब्लिक के सामने विरोधी दलों को नीचा दिखाया जाये कि देखो, तुम जिन्हें वोट देने की सोच रहे हो, वे लोग किस किस्म के हैं ? पब्लिक भी तब नई-नई अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद होकर चुकी थी, लिहाज़ा इस बात को मान लिया करती थी कि हां, हो सकता है कि इन्हीं लोगों ने ऐसा किया हो. तब आतंकवादी नहीं हुआ करते थे और सरकारों को यह प्रॉब्लम थी कि इस घटना का ठीकरा किसके सिर पर फोड़ा जाए ?
आई.पी.एल. मैच से ठीक पहले जिस किस्म के बम-धमाके हुए हैं, उनके बारे में अभी यह सोचा नहीं जा सका है कि किन पर इल्ज़ाम लगाए जाएं कि ये ही असली दोषी हैं और अगर वे हाथ आ गये तो जिन्हें बख्शा नहीं जाएगा. सरकार और उसके नुमाइंदे बहुत सोच समझकर सारे काम करते हैं. सरकार किसी की भी हो, सब की सोच वैसी ही होती है, जैसी कि सरकार चलाये रखने के प्वाइंट ऑफ व्यू से होनी चाहिए. हर सरकार का यह नैतिक फ़र्ज़ बनता है कि वह घटना होने के फ़ौरन बाद ही यह ऐलान कर दे कि इस कांड का खुलासा भी अन्य कांडों की तरह जल्दी ही कर दिया जाएगा. पब्लिक समझ जाती है कि अब इस कांड के खुलासे के लिए, जब तक कई तरह की शिखर-वार्ताएं नहीं होंगी, तब तक कुछ नहीं हो पायेगा.
    हमारे मुल्क की पुलिस भी इतने क़ाबिल है कि वो पहले बम के चिथड़े बटोरती है और उसके बाद यह सोचती है कि अब जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं, उन्हें तत्काल लगने वाली कौन सी सहायता दी जाये कि वे ज़िन्दा होकर इस घटना के चश्मदीद गवाह बन सकें ? घायलों के साथ भी वह कुछ इसी तरह पेश आती है. घायल पड़ा हुआ कराह रहा है और पुलिस पूछने में लगी है कि " कितने आदमी थे ? कैसे थे और कहां के रहने वाले लग रहे थे ? " घायल भी सोचता है कि यह इंडियन पुलिस है, बता दो, वरना ये खुद जाकर भर्ती होने के लिए अस्पताल भी नहीं जाने देंगे. मुर्दों से भी पुलिस बयान ले लेती है कि मरने से पहले उन्होंने क्या देखा ? सरकार को यह कहने को हो जाता है कि घटना की पूरी जांच कर ली गयी है और इस जांच की भी पूरी जांच होनी है कि सही भी है या नहीं. इस अंतिम जांच के पूरी होने तक इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि किन का हाथ है ? विरोधी दलों के नेताओं का या पड़ोसी मुल्क का ? 

दो दिन का मेहमान आदमी


 
             अतुल मिश्र 


करता बहुत गुमान आदमी,
दो दिन का मेहमान आदमी,

अगर मौत की याद रहे तो 
बन जाता इंसान आदमी !

डरा मौत से बनवाता है
ऊंचे बहुत मचान आदमी !

अब नैतिक चरित्र की बातें 
है सुनकर हैरान आदमी !

अगर पेट में भूख ना होती
क्यों बनता शैतान आदमी ?

जिनको इतिहासों ने छापा
थे बस, वही महान आदमी !

ग़लती ना करता तो शायद
कहलाता भगवान आदमी !

Saturday, April 17, 2010

बम-धमाके और इल्ज़ाम





               अतुल मिश्र 

    बम-धमाके होने के बाद हम इतना ज़रूर सोचते हैं कि होने के लिहाज़ से इन्हें नहीं होना चाहिए था और इनके पीछे जिन लोगों का हाथ है, उनको उनके हाथों सहित जल्दी से जल्दी गिरफ्तार कर लेना चाहिए. हमेशा की तरह अगर वे गिरफ्त में नहीं आते हैं,  तो पड़ोसी मुल्क से कहना चाहिए कि वे हमें गिरफ्तार करके दे, ताकि हम उन पर कोई भी ऐसी कार्यवाही कर सकें, जो उचित लगने के हिसाब से उचित हो. धमाके होने के बाद सरकार सोचती है कि इसके पीछे किनका हाथ दिखाया जाना है कि हो सकता है ? बमों के टुकड़ों को जोड़कर हिसाब लगा लिया जाता है कि इस बार भी इनके पीछे विरोधी दलों की कोई साज़िश ना होकर दहशतगर्दों की खुराफात ही लगती है और जिसे बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
    एक ज़माना वह भी था, जब हवा में कोई जहाज भी अगर क्रैश हो गया तो सरकारें अपने विरोधियों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराती थीं कि उन्होंने ही नीचे से फूंक मार कर कोई हरकत की है, जो इस तरह का ख़तरनाक हादसा हो गया. सरकारों पर तब शायद इसके सिवाय कोई काम नहीं था कि किसी तरह पब्लिक के सामने विरोधी दलों को नीचा दिखाया जाये कि देखो, तुम जिन्हें वोट देने की सोच रहे हो, वे लोग किस किस्म के हैं ? पब्लिक भी तब नई-नई अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद होकर चुकी थी, लिहाज़ा इस बात को मान लिया करती थी कि हां, हो सकता है कि इन्हीं लोगों ने ऐसा किया हो. तब आतंकवादी नहीं हुआ करते थे और सरकारों को यह प्रॉब्लम थी कि इस घटना का ठीकरा किसके सिर पर फोड़ा जाये ?
    आई.पी.एल. मैच से ठीक पहले जिस किस्म के बम-धमाके हुए हैं, उनके बारे में अभी यह सोचा नहीं जा सका है कि किन पर इल्ज़ाम लगाए जाएं कि ये ही असली दोषी हैं और अगर वे हाथ आ गये तो जिन्हें बख्शा नहीं जाएगा. सरकार और उसके नुमाइंदे बहुत सोच समझकर सारे काम करते हैं. सरकार किसी की भी हो, सब की सोच वैसी ही होती है, जैसी कि सरकार चलाये रखने के प्वाइंट ऑफ व्यू से होनी चाहिए. हर सरकार का यह नैतिक फ़र्ज़ बनता है कि वह घटना होने के फ़ौरन बाद ही यह ऐलान कर दे कि इस कांड का खुलासा भी अन्य कांडों की तरह जल्दी ही कर दिया जाएगा. पब्लिक समझ जाती है कि अब इस कांड के खुलासे के लिए, जब तक कई तरह की शिखर-वार्ताएं नहीं होंगी, तब तक कुछ नहीं हो पायेगा.
    हमारे मुल्क की पुलिस भी इतने क़ाबिल है कि वो पहले बम के चिथड़े बटोरती है और उसके बाद यह सोचती है कि अब जो लोग इस हादसे में मारे गए हैं, उन्हें तत्काल लगने वाली कौन सी सहायता दी जाये कि वे ज़िन्दा होकर इस घटना के चश्मदीद गवाह बन सकें ? घायलों के साथ भी वह कुछ इसी तरह पेश आती है. घायल पड़ा हुआ कराह रहा है और पुलिस पूछने में लगी है कि " कितने आदमी थे ? कैसे थे और कहां के रहने वाले लग रहे थे ? " घायल भी सोचता है कि यह इंडियन पुलिस है, बता दो, वरना ये खुद जाकर भर्ती होने के लिए अस्पताल भी नहीं जाने देंगे. मुर्दों से भी पुलिस बयान ले लेती है कि मरने से पहले उन्होंने क्या देखा ? सरकार को यह कहने को हो जाता है कि घटना की पूरी जांच कर ली गयी है और इस जांच की भी पूरी जांच होनी है कि सही भी है या नहीं. इस अंतिम जांच के पूरी होने तक इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि किन का हाथ है ? विरोधी दलों के नेताओं का या पड़ोसी मुल्क का ? 

Friday, April 16, 2010

फ्री होने का रिवाज़



         अतुल मिश्र 

     ' फ्री ' शब्द का आकर्षण भारतीयों में तभी से बढा है, जबसे उनका मुल्क अंग्रेजों के चंगुल से फ्री हुआ है. इससे पहले, जब वे फ्री नहीं थे, फ्री होने की वैल्यू से वाक़िफ नहीं थे कि क्या होती है ? आज जब वे फ्री हैं, तब उनके इस्तेमाल किये जाने वाले सामान भी फ्री होने की वैल्यू समझने लगे हैं. कुछ लोगों द्वारा अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला साबुन भी समझने लगा है कि अगर ' दो के साथ एक फ्री ' कर दिया जाये, तो वह कितनी तेज़ी से मार्केट में अपनी पकड़ बनाता है. लोग साबुन का नाम ना बताकर दो के साथ एक फ्री वाला साबुन ही मांगते हैं. इस स्कीम का नामकरण भी कंपनियों ने कर रखा है- टू प्लस वन. इनकी देखा-देखी अन्य उत्पादों ने भी सोचा होगा कि हम ही क्यों पीछे रहें, तो उनके निर्माताओं ने उनकी इस चिंता का निवारण करते हुए उनके लिए ' एक के साथ दो फ्री ' वाला फार्मूला अपनाना शुरू कर दिया.
    मुल्क फ्री होने के बाद से लोग इतने फ्री हो गए कि शुगर तक फ्री बनाने लगे. नमक ने भी बगावत कर दी कि हमने कौन से पाप किये हैं, जो हमको फ्री नहीं किया जा रहा, तो उसके निर्माताओं ने  ' साल्ट फ्री साल्ट '  बनाकर उसको और लोगों के ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने की सोची और जिनको ग़रीब होने की वजह से अभी ब्लड प्रेशर नहीं था, वे भी इसी को इस्तेमाल करने लगे कि आगे चलकर अगर अमीर बनना पड़ा तो यह बीमारी कंट्रोल में रहे. शुगर के मामले में भी वे कुछ इसी किस्म का व्यवहार अपनाने लगे कि आगे चलकर इसी जन्म में अमीर बनने पर काम आये. जिन्हें शुगर या ब्लड प्रेशर की गौरवपूर्ण बीमारी है, वे शुगर फ्री शुगर या साल्ट फ्री साल्ट खाकर अपने दोस्तों को गर्व से बता रहे हैं कि आज कितना ज़्यादा ब्लड प्रेशर था. जितना ज़्यादा ब्लड प्रेशर होता है, उतना ज़्यादा अमीर होता आदमी दिखने लगता है.
    वो वक़्त भी जल्दी ही आने वाला है, जब फ्री होने की इस अंधी दौड़ में रिश्ते भी फ्री होने लगेंगे. मसलन, किसी दिन लोग यह भी डिमांड कर सकते हैं कि  " साहब, हमें तो ' लड़का फ्री लड़का ' चाहिए अपनी लड़की की शादी के लिए. " लड़का फ्री लड़का का मतलब लोग खुद ही समझ जायेंगे कि लड़का तो हो, मगर लड़का होने की तमाम बुराइयों से फ्री हो. जैसे शुगर तो हो, मगर शुगर के अवगुणों से अलग हो. यानि शुगर फ्री हो.  लड़का होते हुए भी लड़का ना होने जैसी अजीब सी बात. यही बात लड़कियों पर लागू होगी कि लड़की फ्री लड़की चाहिए यानि लडकी होने के नैसर्गिक अवगुणों से अलग किस्म की लड़की. लड़की का होते हुए भी लड़की ना होने जैसी बात.
    बेटे फ्री बेटे और बेटियाँ फ्री बेटियों की डिमांड भी ख़ूब चलने लगेगी. लोग डॉक्टरों से कहने लगेंगे कि डॉक्टर साहब, बेटे फ्री बेटे का इंजेक्शन ज़रूर लगा दीजियेगा डिलीवरी से पहले. डॉक्टर खुद समझ जायेगी कि बेटे होने के तमाम अवगुणों से मुक्त बेटा चाहिए बन्दे को. बन्दे के बाप के ज़माने में चूंकि इस किस्म के इंजेक्शन ईज़ाद नहीं हो पाए थे, इसलिए बन्दा बेटा फ्री बेटा नहीं बन पाने की पीड़ा से त्रस्त है और अपनी आगे की नस्लों को सुधारने के काम में लगा है. इसी तरह नेता फ्री नेताओं का रिवाज़ भी खूब च निकलेगा और नेता लोग इलेक्शन से पहले भाषण देते हुए कहा करेंगे कि अगर नेता फ्री नेता चाहिए तो हमें वोट दें. इसका मतलब पब्लिक यह निकाल लिया करेगी कि बन्दा नेता तो है, मगर नेताओं के तमाम अवगुणों से फ्री है.

Monday, April 12, 2010

एक वार्ता मनमोहन-ओबामा की


                            अतुल मिश्र 

    ओबामा खुश थे कि दुनिया भर के मुल्कों के प्रमुख नेता शिखर-वार्ताएं करने अमरीका आये हुए हैं और शिखर-वार्ता के बाद वे अपनी और अपने पड़ोसी मुल्क के बारे में ऐसी-वैसी वार्ताएं भी कर रहे हैं. ख़ासतौर से भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की अलग-अलग क्लासें लेना उन्हें एक अजीब सा सुकून दे रहा था. इस सिलसिले में सबसे पहले मनमोहन सिंह से उनकी वार्ता हुई.
    " हम यह चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार आये. " ओबामा ने अपनी बात की शुरुआत ऐसे की, जैसे भारत के प्रधानमंत्री ही  संबंधों में सुधार ना आने के लिए ज़िम्मेदार हों.
    " जी, आपकी बात भी कहने के लिहाज़ से सही है, मगर जब तक मुंबई-हमलों के दोषियों को सज़ा नहीं मिलती, हम कोई सुधार नहीं ला पायेंगे. " मनमोहन जी की महीन आवाज़ में तटस्थता दिखाई दे रही थी.
    " आपकी बात भी सही है, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी से हम इस बारे में पूछेंगे कि अभी तक उन दोषियों के ख़िलाफ वैसी कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जैसी कि आप चाहते हैं कि हो ? " सरपंच वाली आवाज़ में ओबामा ने मीडिया के नामौज़ूद कैमरों की ओ़र देखते हुए कहा.
    " इसके अलावा पाकिस्तान अपने आतंकवादियों को हमारे मुल्क में भेजना बंद करे. इससे हमें परेशानी होती है. " रिश्तों में सुधार के लिए दूसरी शर्त मनमोहन सिंह ने ऐसी रख दी, जिससे ओबामा को हंसी आ गयी और वे अपनी कुर्सी पर आसन बदलकर बैठ गए.
    " बिलकुल, यह तो ग़लत बात है. इस बारे में भी हम गिलानी से पूछेंगे कि हमसे पूछे बिना ऐसा क्यों हो रहा है ? " ओबामा ने अपने और मनमोहन सिंह की कुर्सी के बीच फासले को देखते हुए उनकी पीठ पर सारी तसल्ली लादे बिना तसल्ली दी.
    " जब तक यह सब नहीं हो जाता, तब तक हम वह सब नहीं कर पायेंगे, जो आप पता नहीं क्यों चाहते हैं कि हो ? " मनमोहन सिंह ने अपने जवाब में से निकलता एक ऐसा सवाल छोड़ा, जो भारत-पाक रिश्तों में सुधार की इस पहल को संदेहास्पद बना रहा था.
    " दरअसल, हम चाहते हैं कि दोनों मुल्कों के रिश्तों में सुधार हो जाये तो आसपास भी शान्ति क़ायम रहेगी. " शान्ति-दूत के चेहरे वाला पोज़ बनाते हुए ओबामा ने अपनी बात सारी दुनिया के सामने रखने की कोशिश की.
    " शान्ति हम भी चाहते हैं, मगर सिर्फ़ हमारे चाहने से क्या होता है ? जब तक पड़ोसी हमारी शान्ति छीनकर अपने मुल्क में उसे स्थापित करने की अपनी गन्दी नीयत नहीं छोड़ देता, हम शांत नहीं बैठ सकते. " सानिया-शोएब की शादी का ज़िक्र किये बिना अपने मुल्क की ' शान्ति'  के पड़ोस में चले जाने से आहत मनमोहन सिंह ने कहा.
    " मैं आपकी पीड़ा को समझ सकता हूं, मगर ऐसी ' शान्ति ' का आप क्या करते, जो आपके मुल्क में अशांति पैदा कर रही हो ? " पता नहीं यह कौन सा नया अलंकार था, जिसके तहत ऐसी सिर-घुमाऊ बात ओबामा के मुंह से निकल गयी और जो सानिया, उसकी शॉर्ट स्कर्ट और पाकिस्तान में उसकी शादी से ताल्लुक रखती थी.
    " आप गिलानी से बात कीजिये कि वे हमारी शान्ति भंग ना करें. हमारे मुल्क में भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो ऐसा करने के हौंसले रखते हैं, मगर हमने कभी ऐसा करने की कोशिश नहीं होने दी. " मनमोहन सिंह ने सानिया के टेनिस खेलने के अंदाज़ और तेज़ हवा के चलने की कल्पना करते हुए ओबामा को अपनी नितांत गोपनीय और व्यक्तिगत पीड़ा से अवगत कराया.
    " आप बिलकुल चिंता ना करें, मिस्टर सिंह. हम इन तमाम बातों पर विस्तार से गिलानी से वार्ता करेंगे. आप अब आराम कीजिये, थक गए होंगे आप. " ओबामा ने मनमोहन जी की आत्मिक पीड़ा को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखते हुए कहा.
    इसके बाद वहां मौजूद हमारे विशेष सूत्र ने अपना नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर हमें बताया कि ओबामा ने अपने पास रखी मेज़ में छिपी घंटी  बजाई और बिना " नेक्स्ट " की आवाज़ सुने पकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी उनके सामने हाज़िर हो गए. 
    

Sunday, April 11, 2010

नेता भी कैसे बन्दे हैं ?



                       अतुल मिश्र 

नेता भी कैसे बन्दे हैं ?
आँखें हैं, फिर भी अन्धे हैं,

मछर इन पर नहीं भिनकते,
ये इतने ज़्यादा गन्दे हैं !

बाहर से तो कलफ लगे हैं,
अन्दर से कच्चे अन्डे हैं !

इनकी दिनचर्या मत पूछें,
इनके मंडे भी सन्डे हैं !

वादे पूर्ण करें वादों से,
ये इनके अपने फंडे हैं !

कुदरत इसमें क्या कर लेगी ?
गोरे हैं, काले धन्धे हैं !

छापा अगर पड़े तो बोलें,
वो चुनाव था, ये चन्दे हैं !

ईमां की  जो निकली अर्थी,
ये उसके चौथे कन्धे हैं !

भाषण, वादे, तो जनता को,
सिर्फ़ फंसाने के फन्दे हैं !

सब पर अपना-अपना कुछ है,
उन पर सिर, हम पर डंडे हैं !

Saturday, April 10, 2010


अतुल मिश्र 
अमरीका जाने के कई सारे फायदे भारतीय प्रधानमंत्री को होते हैं. एक तो पड़ोसी मुल्कों की शिकायतें करने का बहाना मिल जाता है और दूसरा अगर ज़रुरत पड़े तो वहां के राष्ट्रपति का मूड देखकर उनको लादेन सहित अन्य दहशतगर्दों के बारे में अपनी ख़ुफ़िया जानकारियां दी जा सकती हैं कि वे इस समय पाकिस्तान में छुपे हुए हैं. इस तरह एक तीर से कई सारे निशाने लगाए जा सकते हैं. वे भी खुश कि क्या गोपनीय जानकारी हासिल हो गयी और उधर पड़ोसी के दिमाग भी दुरुस्त कि कहीं अमरीका हमला ना कर दे या उधार देने से इन्कार ना कर दे. शिखर-वार्ता से अलग जब वक़्त मिले तब प्रधानमंत्री ने धीरे से ओबामा के कान में कह दिया कि अमरीका का दुश्मन नंबर वन अभी भी वहीँ छिपा हुआ है, जहां के बारे में अमरीका ने सख्त मना किया हुआ है कि वह वहां हरगिज़ नहीं छिपे.

हमारे प्रधानमंत्री को अमरीका से उतना ही प्यार है, जितना अपनी जवानी के दिनों में वे अपने कॉलेज की किसी लड़की को करते रहे होंगे. कई मर्तबा यह भी देखा गया कि वे अमरीका जाकर हंसने, मुस्कराने लगते हैं. अन्य देशों में जाकर वे ऐसा नहीं कर पाते. ख़ासतौर से जब परमाणु हथियारों के इस्तेमाल ना करने को लेकर कोई सवालिया वार्ता होती है, तो वे मुस्कराने लगते हैं. इसके कई सारे अर्थ लगाए जा सकते हैं. एक तो यह भी लगाया जा सकता है कि वे इस सवाल को ही बुनियादी तौर पर ग़लत मानते हैं और दूसरा यह कि वे सोच रहे हो सकते हैं कि यार, हमें परमाणु हथियार इस्तेमाल ना करने की नसीहत देकर पड़ोसी मुल्कों को क्या बताया जा रहा कि तुम अपने सारे परमाणु हथियार हमारे मुल्क में झोंक दो और हम कुछ नहीं कहेंगे या फिर उस पोज़ीशन में ही नहीं रहेंगे कि कुछ कह सकें.

शिखर-वार्ताएं हमेशा ज़मीन पर ही होती हैं. यह नहीं कि इनके लिए पर्वत के शिखरों पर ही जाना  पड़े. इस किस्म की वार्ताओं को ' शिखर-वार्ताएं' ही क्यों कहा जाता है, इस पर हमारे मित्र राम भरोसे का मानना है कि यहां दुनिया के तमाम देशों की बातचीतें इतनी ज़्यादा होती हैं कि उनका एक शिखर सा बन जाता है, इसलिए ये शिखर वार्ताएं कहलाती हैं. अपने मित्र के इस ज्ञान पर बिना नाज़ किये हुए हम इसे स्वीकार लेते हैं. शिखर वार्ताओं का हल भी अन्य सभी छोटी-मोटी वार्ताओं की तरह यही निकलता है कि इसका असली हल अगली शिखर वार्ता में ही निकलेगा. 

ओबामा ने कुछ सोचकर ही इस शिखर वार्ता का आयोजन किया होगा. बहुत दिनों तक अगर वार्ताएं ना हों तो अमरीका की जनता को लगता होगा कि उनके मुल्क में कुछ हो ही नहीं रहा, जिससे लगे कि हम दहशतगर्दी के ख़िलाफ हैं और लादेन आदि को अभी भूले नहीं हैं. व्हाईट-हाउस पर दवाब पड़ा होगा कि कुछ वार्ता-शार्ता जैसे काम करें ताकि कुछ हल ना निकलने की दिशा में कुछ किया जा सके. किसी  भी मुल्क में किसी भी वार्ता का कोई हल कभी निकला हो, ऐसा हमें याद नहीं आ रहा. फिर भी अगर यह शिखर-वार्ता की जा रही है तो इसके भी हल ना निकलने का हमें इंतज़ार करना होगा, ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत भावी वार्ताएं करने के काम आएं.

बोलो क्या करें ?



            अतुल मिश्र 

तुम नहीं हो अब हमारे पास, बोलो क्या करें ?
जा रहा है पास से मधुमास, बोलो क्या करें ?

यह पता है कि नहीं मिल पायेंगे इस दौर में,
है जुदाई का गहन अहसास, बोलो क्या करें ?

तुम मनाने के लिए, रूठे रहे कुछ जानकर,
पर हमें बिलकुल नहीं अभ्यास, बोलो क्या करें ?

हम किसी सागर को जितना पी सके थे, पी चुके,
और ज़्यादा बढ गयी है प्यास, बोलो क्या करें ?

हम हलाहल पी चुके हैं, व्यंग्य के, उपहास के.
ज़िन्दगी में हैं विरोधाभास, बोलो क्या करें ?

रात में गहरा अकेलापन, उदासी, व्यग्रता,
बस, यही हैं दोस्त अपने ख़ास, बोलो क्या करें ?

जब जनाजा जा रहा होगा, हमारा, आओगी,
है हमें इतना अधिक विश्वास, बोलो क्या करें ?

Friday, April 9, 2010


देश सेवा एक नेता की

Posted Star News Agency Thursday, April 08, 2010 
अतुल मिश्र
देश की सेवा करने के साथ ही अपनी और अपने परिवार की सेवा करने वाले नेता के कुछ ऐसे उसूल थे, जो खुद के अपने थे और उन पर जनता को भले ही नाज़ ना हो, मगर उन्हें इन पर नाज़ था. वे एक ऐसी पार्टी के वरिष्ठ नेता थे, जिसके कुछ अपने उसूल थे और जो वक़्त के हिसाब से बदल जाया करते थे. लेकिन नेता जी के उसूलों ने बदलने से मना कर दिया था, इसलिए वे यथावत रहे और आज भी हैं. उनकी पार्टी जब सत्ता में थी, तब भी उसूलों ने बदलने से शायद मना कर दिया था कि हमें नहीं बदलना. काम के बदले दाम अगर लेने हैं तो लेने हैं, यह नहीं कि फ़ोकट में काम कर दिया कि उनके साले के सगे साले के बहनोई का मसला है तो कुछ ना लें. देश की सेवा के लिए यह उनका पहला उसूल था और जिसके बिना वे देश-सेवा को असंभव मानते थे.

डकैती के पेशे में जब उन्होंने यह देखा कि कोई ख़ास इनकम अब नहीं रही और कभी भी पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर हवालात में बैंतों से सुताई हो सकती है, तो वे देश की सेवा वाले काम में कूद पड़े. इसमें उन्हें ज़्यादा मुनाफा दिखाई दिया. जो लोग उन्हें कल तक ' कलुआ ' कहकर बुलाते थे, आज वही लोग उन्हें श्री काली प्रसाद जी कहकर संबोधित किया करते हैं. अपने इलाके से चुनाव जीतकर वे यह बात साबित कर चुके थे कि कितनी भी अत्याधुनिक वोटिंग मशीनें मंगा ली जाएं, उनके वोट उतने ही पड़ेंगे, जितने उन्होंने सोच रखे थे कि पड़ने चाहिए. डकैती के दिनों में उनकी गोपनीय समाज-सेवा भी इसकी एक अहम् वजह थी.

पहले वे सिर्फ़ अपने धर्म में ही आस्था रखते थे, मगर सियासत में आने के बाद वे सभी धर्मों को समानता के भाव से देखने लगे थे और अक्सर अन्य धर्मों के धार्मिक कार्यक्रमों में बिना निमंत्रण के ही पहुंच जाया करते थे. यह बात भी लोगों को बेहद प्रभावित करती थी कि जिसके मारे कभी पुलिस सहित सारा इलाका कांपता था, वह अब उनके समारोह में बिना बुलाये आने लगा है, तो लोगों ने दूसरे गुंडे और टुच्चे प्रत्याशियों की जगह उन्ही को वोट देना ज़्यादा मुनासिब समझा. इसी के बल पर वे कई सालों से चुनाव जीतकर देश की सेवा कर रहे थे.
उनके कई उसूलों में से एक यह भी था कि मंत्री बनने के बाद तमाम गांवों की ग़रीब महिलाओं के घर जाकर वे खाना ज़रूर खाते थे और बाक़ायदा अपने फ़ोटो भी खिंचवाते थे ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रूरत अखबारों में न्यूज़ सहित छपवाने के काम आए. इस दौरान जिसके हाथ का खाना ज़्यादा अच्छा लगता था, वे एक रात उसके घर रुकने का सौभाग्य भी उसे प्रदान करते थे. ऐसे सौभाग्यों से वे कई महिलाओं को नवाज़ चुके थे. मीडिया वालों ने जब इस पर अपनी शंका ज़ाहिर की तो उन्होंने अपनी उम्र का हवाला देते हुए यह साफ़ कर दिया कि वे यह सब देश के लिए ही कर रहे हैं. और यह बात सही भी थी कि देश की इसी सेवा की बदौलत आज गांव-गांव में उनकी औलादें हैं और जो ग्राम-प्रधानी के चुनावों से अपनी देश की ख़ातिर नेतागिरी की शुरुआत कर रही हैं.

Thursday, April 8, 2010

देश-सेवा एक नेता की


  
                     अतुल मिश्र 
    
    देश की सेवा करने के साथ ही अपनी और अपने परिवार की सेवा करने वाले नेता के कुछ ऐसे उसूल थे, जो खुद के अपने थे और उन पर जनता को भले ही नाज़ ना हो, मगर उन्हें इन पर नाज़ था. वे एक ऐसी पार्टी के वरिष्ठ नेता थे, जिसके कुछ अपने उसूल थे और जो वक़्त के हिसाब से बदल जाया करते थे. लेकिन नेता जी के उसूलों ने बदलने से मना कर दिया था, इसलिए वे यथावत रहे और आज भी हैं. उनकी पार्टी जब सत्ता में थी, तब भी उसूलों ने बदलने से शायद मना कर दिया था कि हमें नहीं बदलना. काम के बदले दाम अगर लेने हैं तो लेने हैं, यह नहीं कि फ़ोकट में काम कर दिया कि उनके साले के सगे साले के बहनोई का मसला है तो कुछ ना लें. देश की सेवा के लिए यह उनका पहला उसूल था और जिसके बिना वे देश-सेवा को असंभव मानते थे.
    डकैती के पेशे में जब उन्होंने यह देखा कि कोई ख़ास इनकम अब नहीं रही और कभी भी पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर हवालात में बैंतों से सुताई हो सकती है, तो वे देश की सेवा वाले काम में कूद पड़े. इसमें उन्हें ज़्यादा मुनाफा दिखाई दिया. जो लोग उन्हें कल तक ' कलुआ ' कहकर बुलाते थे, आज वही लोग उन्हें श्री काली प्रसाद जी कहकर संबोधित किया करते हैं. अपने इलाके से चुनाव जीतकर वे यह बात साबित कर चुके थे कि कितनी भी अत्याधुनिक वोटिंग मशीनें मंगा ली जाएं, उनके वोट उतने ही पड़ेंगे, जितने उन्होंने सोच रखे थे कि पड़ने चाहिए. डकैती के दिनों में उनकी गोपनीय समाज-सेवा भी इसकी एक अहम् वजह थी.
    पहले वे सिर्फ़ अपने धर्म में ही आस्था रखते थे, मगर सियासत में आने के बाद वे सभी धर्मों को समानता के भाव से देखने लगे थे और अक्सर अन्य धर्मों के धार्मिक कार्यक्रमों में बिना निमंत्रण के ही पहुंच जाया करते थे. यह बात भी लोगों को बेहद प्रभावित करती थी कि जिसके मारे कभी पुलिस सहित सारा इलाका काँपता था, वह अब उनके समारोह में बिना बुलाये आने लगा है, तो लोगों ने दूसरे गुंडे और टुच्चे प्रत्याशियों की जगह उन्ही को वोट देना ज़्यादा मुनासिब समझा. इसी के बल पर वे कई सालों से चुनाव जीतकर देश की सेवा कर रहे थे.
    उनके कई उसूलों में से एक यह भी था कि मंत्री बनने के बाद तमाम गाँवों की ग़रीब महिलाओं के घर जाकर वे खाना ज़रूर खाते थे और बाक़ायदा अपने फ़ोटो भी खिंचवाते थे ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत अखबारों में न्यूज़ सहित छपवाने के काम आये. इस दौरान जिसके हाथ का खाना ज़्यादा अच्छा लगता था, वे एक रात उसके घर रुकने का सौभाग्य भी उसे प्रदान करते थे. ऐसे सौभाग्यों से वे कई महिलाओं को नवाज़ चुके थे. मीडिया वालों ने जब इस पर अपनी शंका ज़ाहिर की तो उन्होंने अपनी उम्र का हवाला देते हुए यह साफ़ कर दिया कि वे यह सब देश के लिए ही कर रहे हैं. और यह बात सही भी  थी कि देश की इसी सेवा की बदौलत आज गांव-गांव में उनकी औलादें हैं और जो ग्राम-प्रधानी के चुनावों से अपनी देश की ख़ातिर नेतागिरी की शुरुआत कर रही हैं.