Saturday, April 24, 2010

भविष्यवाणी एक मानसून की


भविष्यवाणी एक मानसून की 
                       अतुल मिश्र 
    सरकार जब यह महसूस करने लगती है कि पब्लिक गर्मी के अलावा बिजली-कटौती और महंगाई जैसी अपने आप उत्पन्न होने वाली समस्याओं से  ग्रस्त है, तो उसे खुश करने के लिए कुछ ऐसे विद्वान् समझे जाने वाले विद्वानों से परामर्श किया जाता है, जो मौसम विभाग के दफ्तरों में बैठे जम्हाइयां ले रहे होते हैं. उनसे पूछा जाता है कि हर साल की तरह इस साल भी क्या देख रहे हैं कि मौसम कैसा रहेगा ? वहां से सूचना आती है कि किसान नाम का वोटर इस साल सबसे ज़्यादा खुश रहेगा, क्योंकि मूसलाधार बारिश होने के तमाम संकेत हैं. इस साल सिर्फ़ मूसल ना बरसकर लगातार मूसलाधार बारिश होने की भी निन्न्यान्वे प्रतिशत संभावना है. एक प्रतिशत इसलिए छोड़ दी कि मानसून का मूड बदल गया और वो पड़ोसी मुल्क की तरफ निकल लिया तो फ़जीहत ना हो कि मौसम विभाग ने तो ऐसा कहा था और यह क्या हो रहा है ?
    मौसम विभाग ही एक मात्र दुनिया का ऐसा विभाग है, जो ईश्वर में पूरी आस्था रखता है. जो करेगा, वही करेगा, हम तो उसकी सिर्फ़ भविष्यवाणी कर सकते हैं कि वह क्या करने जा रहा है ? भविष्यवाणी ग़लत हो गयी तो बता दिया कि जैसी प्रभु की इच्छा !  इस महकमे के हालत कुछ ऐसे हो गए हैं कि हिन्दुस्तानी लोग इनकी भविष्यवाणियों पर अब यक़ीन नहीं करते और उन्होंने अगर कहा कि मूसलाधार बारिश होगी, तो किसान फ़ौरन किसी साहूकार से एडवांस में उधार ले लेता है कि सूखा पड़ने के वक़्त काम आएगा. मौसम विभाग जो कहे उसका उल्टा समझकर उसी हिसाब से लोग अपनी व्यवस्थाएं कर लेते हैं.
    सूखा पड़ने की सूचना मिलने पर किसान अपना बाहर पड़ा अनाज उठाकर झोंपड़ी में रख लेता है और जिन पर अपने पक्के मकान होते हैं, वे उसकी छतों की दरारें ठीक कराने लग जाते हैं कि अचानक मानसून आ गया तो एक अच्छा और ग़रीब वोटर होने के नाते मुफ्त में मिले इस सरकारी मकान में कहीं मुंह छिपाने को जगह तो मिल जाये ? वरना इन आवंटित मकानों के निर्माण में रेता तो लगा ही है, जहां ज़रुरत समझी गयी है, सीमेंट का छौंका भी लगा दिया गया है कि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत मकान ढहने के बाद सीमेट के अवशेष ढूंढ़कर दिखाने के काम आये.
    पहले लोग मौसम का हाल चिड़ियों के पानी में नहाने, चींटियों के अन्डे ले जाने और गधों के लोटने से ही अंदाज़ लगा लिया करते थे कि घमासान बारिश होगी. और ऐसा भी नहीं है कि बारिश ना होती हो कि मैं तो नहीं होती. उसे चिड़ियों, चींटियों और गधों की लाज बचाने के लिए होना ही पड़ता था. अब वैसी बातें नहीं रहीं और मौसम विभाग ने चिड़ियों, चींटियों और गधों के कार्य संभाल लिए कि अब हमें करने है तो वे कर रहे हैं. यह भी हो सकता है कि मौसम विभाग अपने उपकरणों की असफलता के बाद इन्हीं प्राकृतिक संकेतों का सहारा ले रहा हो, क्योंकि कई साल पहले मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी कि आज बारिश होगी तो बाक़ायदा अगले दिन बारिश हो गयी थी. 

1 comment:

Rajendra Swarnkar said...

अच्छा व्यंग्य है 'भविष्यवाणी एक मानसून की '।
सर पर डंडा मार कर काख में गुदगुदी करके हंसाने के सफल प्रयास की तरह गुदगुदाया है आपने ।
सरकार की हर बात विपरीत परिणाम वाली नहीं होती लेकिन । बीच में महं गाई बढ़ सकने की संभावना व्यक्त करने के साथ ही महगाई तो बढ़ाई थी न सरकार ने ।

मैं तब ही तो राजस्थानी में कहता हूं -
नमो नमो सरकार बापजी
घणो घणो उपकार बापजी
जीवणदो या मारो म्हांनैं ,
थांनैं सौ इधकार बापजी
पुनः बधाई !
- राजेन्द्र स्वर्णकार