Wednesday, September 30, 2009

एक शिक्षित बेरोजगार का पत्र !

पत्र लिखूं क्या, समझ न पाता, बाबूजी , दिल्ली आकर अब पछताता, बाबूजी,

पढ़-लिखकर भी कहीं नौकरी नहीं मिली- इस बारे में क्या बतलाता, बाबूजी ?

अब गद्दी के नीचे अपनी डिग्री रख, रिक्शा में दिन-रात चलाता, बाबूजी !

एक पुलिस वाला कल मुझको पीट गया - मैं उस पर कैसे चिल्लाता, बाबूजी !

माँ पूछे, तो उसको झूठ बता देना - " तेरा बेटा खूब कमाता ", बाबूजी !

अभी सिर्फ़ दस-बीस रुपये बच पाते हैं - वरना पैसे घर भिजवाता, बाबूजी !

सोचा करता, कहीं नौकरी पड़ी मिले - इसीलिए संसद तक जाता, बाबूजी !

2 comments:

अजय सकलानी said...

नमस्कार अतुल जी, अरुणा जी की फेसबुक प्रोफाइल के द्वारा आप तक पहुंचा.... आपको पढ़ कर बहुत अच्छा लगा| यह पत्र जिस तरह बेरोजगारी का हाल बयान करता है...किस इस बेरोजगारी को हमारी सर्कार इतनी आसानी से समझ पाती...

शुभकामनाएं...

कुछ दिल से....

hindwaarta said...
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